मैथिली सिनेमा की शुरुआत: 1965 की ‘कन्यादान’ से एक सांस्कृतिक यात्रा
परिचय
जब भी भारतीय सिनेमा की बात होती है, तो हिंदी, बंगाली, तमिल या मलयालम फिल्मों का ज़िक्र आम है। लेकिन इसी देश में एक ऐसी भाषा भी है, जिसकी अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा, लोकसंस्कृति और सामाजिक पहचान है — मैथिली। मैथिली सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भाषाई स्वाभिमान, सामाजिक दस्तावेज़ और सांस्कृतिक स्मृति का माध्यम रहा है। इस यात्रा की शुरुआत होती है वर्ष 1965 में बनी एक ऐतिहासिक फिल्म से — ‘कन्यादान’।
मैथिली सिनेमा क्यों ज़रूरी है?
मैथिली भाषा केवल संवाद की
भाषा नहीं, बल्कि मिथिला की पूरी जीवनशैली को अपने भीतर समेटे हुए है — विवाह परंपराएँ, लोकगीत,
सामाजिक मूल्य, स्त्री-पुरुष संबंध और पारिवारिक संरचना।
मुख्यधारा के सिनेमा में ये सब अक्सर या तो गायब रहते हैं या फिर गलत तरीके से प्रस्तुत किए जाते
हैं।
मैथिली सिनेमा का महत्व इसलिए है क्योंकि यह:
- स्थानीय समाज की अंदर से कहानी कहता है
- लोकसंस्कृति को दृश्य रूप देता है
- भाषा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रहने देता
- आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक रिकॉर्ड बनता है
इसी सोच की पहली ठोस कोशिश थी — ‘कन्यादान’।
‘कन्यादान’ (1965): एक ऐतिहासिक शुरुआत
‘कन्यादान’ को मैथिली भाषा की पहलीफीचर फिल्म माना जाता है। यह फिल्म 1965 में रिलीज़ हुई और इसने यह साबित कर दिया कि क्षेत्रीय भाषाओं में भी गंभीर, स्तरयुक्त सिनेमा संभव है।
पृष्ठभूमि
यह फिल्म प्रसिद्ध मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा के उपन्यास ‘कन्यादान’ पर आधारित थी। उपन्यास पहले से ही मिथिला समाज में लोकप्रिय था, इसलिए फिल्म की कहानी लोगों से तुरंत जुड़ गई। हालाँकि फिल्म पूरी तरह शुद्ध मैथिली में नहीं थी — कुछ संवाद हिंदी में भी थे — लेकिन उस समय के संसाधनों और दर्शक वर्ग को देखते हुए यह एक व्यावहारिक निर्णय था।
कहानी और विषयवस्तु: समाज का आईना
‘कन्यादान’ की कहानी मिथिला समाज की विवाह व्यवस्था, दहेज प्रथा, और पारिवारिक दबावों को सामने लाती है।
फिल्म दिखाती है:
- विवाह सिर्फ एक संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक सौदेबाज़ी कैसे बन जाता है
- बेटियों पर पड़ने वाला मानसिक और भावनात्मक बोझ
- परिवार की इज़्ज़त बनाम व्यक्ति की इच्छा
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं थी, बल्कि उस दौर के जीते-जागते समाज का प्रतिबिंब थी। यही कारण है कि दर्शक इसे “फिल्म” की तरह नहीं, बल्कि “अपनी कहानी” की तरह देखते थे।
संगीत: लोकधुनों की आत्मा
‘कन्यादान’ का संगीत इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक था। गीतों में मैथिली लोकधुनों की सादगी, मिठास और भावनात्मक गहराई साफ दिखाई देती है।
इन गीतों ने:
- मिथिला की लोकसंगीत परंपरा को पहचान दी
- भाषा को भावनाओं के ज़रिये लोगों तक पहुँचाया
- यह साबित किया कि लोकसंगीत भी सिनेमा में उतना ही प्रभावशाली हो सकता है
आज भी जब मैथिली सिनेमा के संगीत की बात होती है, तो ‘कन्यादान’ को एक संदर्भ बिंदु के रूप में देखा जाता है।
फणी मजूमदार: एक निर्णायक भूमिका
अगर
‘कन्यादान’ सिर्फ एक प्रयोग बनकर रह जाती, तो शायद मैथिली सिनेमा का भविष्य यहीं
खत्म हो जाता।
लेकिन यहाँ निर्णायक भूमिका निभाई फणी मजूमदार ने।
वे कौन थे?
फणी मजूमदार पहले से ही हिंदी और बंगाली सिनेमा के एक स्थापित निर्देशक थे। उनके पास:
- तकनीकी अनुभव था
- कहानी कहने की समझ थी
- और सबसे ज़रूरी — सिनेमा को गंभीरता से लेने का दृष्टिकोण था
उनका योगदान
- उन्होंने ‘कन्यादान’ को पेशेवर स्तर पर बनाया
- कैमरा, एडिटिंग और निर्देशन में समझौता नहीं किया
- यह दिखाया कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्म भी गुणवत्ता में पीछे नहीं होती
यही कारण है कि पहली मैथिली फिल्म होते हुए भी ‘कन्यादान’ को एक मानक माना गया।
सांस्कृतिक प्रभाव और ऐतिहासिक महत्व
‘कन्यादान’ का प्रभाव बॉक्स ऑफिस से कहीं आगे तक गया। इस फिल्म ने:
- मैथिली भाषा को सिनेमा की भाषा बनाया
- साहित्य और सिनेमा के बीच पुल बनाया
- आने वाले फिल्मकारों को यह साहस दिया कि वे अपनी भाषा में सोचें
हालाँकि इसके बाद मैथिली सिनेमा को लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा — धन, वितरण और थिएटर की कमी के कारण — लेकिन बीज बोया जा चुका था। बाद में आने वाली फिल्में, और 21वीं सदी में हुआ पुनर्जागरण, इसी नींव पर खड़ा हुआ मैथिली चलचित्र।

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