परीक्षण
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ
अह के बाप छैथ पतित रुपैया ललेलक अधिक
अहाँकेँ पढ़ा-लिखा क बरद बनाक बेच लेलैन यौ
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ ||
अहाँकेँ माय छैथ खेलारि लेलैन दुधक दाम धराय
ताय त हमरा बाबु हाथे आँहा के बाबु बेच लेलैन यौ
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ ।
अहाँ के भाई छथि कुकरमि रुपया क लेलनि बैमानी
अपना बौह के नामैं बैंक में जमा केलैन यौ
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ ।
अहाँ के ससुर जी छथि ठार सबटा पुरेता अहाँ के आश
तें त सबटा सम्पति बेच अहाँ के किन लेलैन यौ
दूल्हा मिथिला में आबि क बिका गेलऊ यौ।
गीतका अर्थ
यह मैथिली लोक-परंपरा का एक व्यंग्यात्मक गीत है, जो मिथिलांचल की सामाजिक सच्चाई, विशेष रूप से दहेज प्रथा, पर तीखा कटाक्ष करता है। इस गीत की शैली जानबूझकर तंज़ और आरोप वाली रखी गई है, जहाँ दूल्हे से सीधे कहा जाता है कि वह मिथिला आकर “बिक गया” है — अर्थात उसका विवाह प्रेम या संस्कार से नहीं, बल्कि पैसे के लेन-देन से हुआ है।
गीत में दूल्हे के पिता को लालची बताया गया है, जिसने अधिक धन लेने के लिए बेटे को पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाकर बेच दिया। माँ पर भी कटाक्ष है कि उसने अपने मातृत्व (दूध) का मूल्य वसूल कर लिया। भाई को कुकर्मी कहकर यह दर्शाया गया है कि दहेज के पैसे को अपनी पत्नी के नाम बैंक में जमा कर दिया गया ।
वहीं कन्या के पिता (ससुर) को ऐसा व्यक्ति बताया गया है जिसने दूल्हे की हर आशा पूरी करने के लिए अपनी सारी संपत्ति तक बेच दी, क्योंकि दूल्हा अब खरीदी गई वस्तु की तरह माना जा रहा है।
मुख्य संदेश:
पूरा गाना इस विषय पर आधारित है कि दहेज प्रथा ने विवाह जैसी पवित्र बन्धन को खरीदने-बेचने के धंधे में बदल दिया है। यह गाना किसी विशेष व्यक्ति पर हमला नहीं करता, बल्कि उस गलत सोच पर हमला करता है जो लोगों, रिश्तों और इज्ज़त को पैसे से मापती है।
यह गीत पारंपरिक भक्ति भाव और विवाह से जुड़ी भावनाओं को दर्शाता है।

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