उपनयन
देखु मिथिला के रीत
देखु मिथिला के रीत,
मड़वा पर बरुआ ॥२॥
पहिले जे माँगलनि अम्मा सँ भीख ॥२॥
देखि पितर सब भेला हर्षित
देखु मिथिला के रीत
दादी जे देलखिन चाउरक भीख ॥२॥
तहि के उपर अंगूठी सहित
देखु मिथिला के रित,
मड़वा पर बरुआ ॥२॥
मगै छथि भिख
तखन जे मगलैंह नानी सँ भिख ॥२॥
चुरा के उपर ॥२॥
चेन सहित, देखु मिथिला के रित
मामि जे देलनिह फलक भिख ॥२॥
मामा कमाई स॥२॥
असर्फि सहित, देखु मिथिला के रित
गीतका अर्थ
यहयह गीत मिथिला के उपनयन संस्कार के दौरान होने वाली “भिखहरि” रस्म का वर्णन करता है, जिसमें मंडप (मड़वा) पर बैठा बरुआ (बालक) सबसे पहले अपनी माँ से भिक्षा मांगता है। इसके बाद दादी, नानी, मामी और अन्य रिश्तेदार उसे चावल, चूड़ा, फल तथा गहने या धन देकर आशीर्वाद देते हैं। गीत में हर रिश्ते का प्रेम, सम्मान और सहभागिता दिखाई देती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि पूरे परिवार के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है। पितरों के प्रसन्न होने का उल्लेख यह बताता है कि इस परंपरा को पूर्वजों से चली आ रही पवित्र परंपरा माना जाता है।
भिखहरि रस्म का वास्तविक अर्थ भीख मांगना नहीं बल्कि विनम्रता, अनुशासन और नए जीवन चरण में प्रवेश का प्रतीक है। उपनयन के बाद बालक को ब्रह्मचर्य और शिक्षा के मार्ग पर चलने वाला माना जाता है, इसलिए उसे सिखाया जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए अहंकार छोड़कर झुकना जरूरी है। मिथिला की संस्कृति में यह रस्म रिश्तों की जिम्मेदारी और आशीर्वाद को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का माध्यम भी है, हालांकि आज कई जगह इसका मूल भाव कम होकर केवल दिखावे तक सीमित होता जा रहा है।

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