महेशवाणी
दुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना
देदुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना
सखि हे पढ़ि पोथी ओ पतरा बिसरलौं कोना ॥२॥
बसहा पीठ छथि असवार, कर त्रिशूल-मुन्डमाल
पैर फाटल बेमाय, उगल पेट, सटकल गाल
सखि हे, तीन अँखिया बकर-बकर तकै छथि कोना
दुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना॥२॥
श्वेत केश, दाँत टुटल, कम्पवात गातमे
भूत ओ पिशाच साजि लयला बरियातमे
सखि हे नाकहीन, कानहीन दाँतटुटल छनि कोना
दुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना॥२॥
घर-द्वार नहि छनि केयो नहि संगमे
आँक-धथूर-गाँजा, रूचि सदा भंगमे
सखि हे तनिका संग गौरी धीया रहती कोना
सुन्दर सुकुमारि गौरी रहै छथि उमंगमे
सखी सहेली संग खेलैत छथि सुसंगमे
सखि हे तिनका सङ्ग गौरि धिया रहति कोना
दुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना॥२॥
महिमा अगम अपार बालक अहि योग के
देव दनुज धरत ध्यान हरता सब सोक के
सखि हे रामेस्वर एहन वर के पेरबनि कोना
दुर-दुर नारद एहन बर लयलौं कोना॥२॥
सखि हे तिनका एहन बर करबनि कोना
गीतका अर्थ
इस गाने में, गौरी की सहेलियां नारद मुनि से शिकायत करती हैं कि वह उसके लिए ऐसा दूल्हा कैसे ढूंढ पाए। वे भगवान शिव के रूप को देखकर डर जाती हैं। वे कहती हैं कि शिव एक बैल (नंदी) पर सवार होते हैं, हाथ में त्रिशूल लिए होते हैं, और गले में खोपड़ियों की माला पहनते हैं। उनके पैर फटे हुए हैं, पेट निकला हुआ है, गाल धंसे हुए हैं, और उनकी तीन आंखें अजीब तरह से सबको घूरती हुई लगती हैं। उनके बाल सफेद हैं, कई दांत टूटे हुए हैं, और उनका शरीर बूढ़ा और कांपता हुआ दिखता है। उनकी बारात में भूत-प्रेत शामिल हैं। उनका कोई अच्छा घर या परिवार नहीं है। उन्हें आक, धतूरा, गांजा और भांग बहुत पसंद हैं। सहेलियां सोचती हैं कि गौरी, जो इतनी सुंदर, अच्छे व्यवहार वाली और महल में पली-बढ़ी है, अपनी सहेलियों के साथ खुशी-खुशी रह रही है, ऐसे दूल्हे के साथ कैसे रहेगी।

0 Comments